मनोज
अपनी भावनाएं, और विचार बांट सकूं।
सोमवार, 4 जून 2012
इस ब्लॉग की 950वीं पोस्ट : अतल गहराइयों में
शनिवार, 2 जून 2012
फ़ुरसत में … फ़ुरसत से मीठी यादें बांटते हुए!
फ़ुरसत में …
फ़ुरसत से मीठी यादें बांटते हुए!
घर का बरामदा, बरामदे में लगी एक आराम कुर्सी, आरामकुर्सी के बगल में एक तिपाई, तिपाई पर चाय का प्याला, प्याले के पास प्लेट में सजे बिस्किट, बिस्किट के साथ पानी का ग्लास... आराम कुर्सी पर अधलेटे, आँखें बंद किये, पेंडुलम की तरह झूलते हुए, कुछ सोचते हुए, कुछ याद करते हुए, मन ही मन मुस्कुराते हुए - इस नज़ारे को अगर कोई नाम देना हो, तो क्या नाम देंगे आप? बहुत ही आसान है, उसे हम कहेंगे – फ़ुरसत में! हमने भी सोचा कि आज थोड़ा सस्पेंस पैदा करते हैं और मनोज कुमार जी को फ़ुरसत में भेज देते हैं और खुद जम जाते हैं उनकी कुर्सी पर, जिसका नाम है – फ़ुरसत में!
सप्ताहांत में उनके कार्यालय की छुट्टी और वे अपने मनपसंद किसी भी हलके फुल्के विषय पर नितांत अपनी बात कहते हैं. अपने सार्वजनिक अथवा व्यक्तिगत जीवन की कोई घटना या कोई विषय लेकर उसके आस-पास एक ताना बाना शब्दों का, भावनाओं का, सन्देश का, शुद्ध हास्य का या किसी व्यंग्य का. उनके व्यंग्य का केंद्र भी प्रायः वे स्वयं ही रहे हैं. एक मर्यादा, एक सीमा, एक शिष्टाचार, संबंधों का मान... यह सब उनकी फ़ुरसत में की रचनाओं में देखे होंगे आप सभी ने.
दिल्ली में रहते हुए, उनसे कई बार मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. कारण मेरा कार्यालय ऐसी जगह पर था जहाँ आसानी से पहुंचा जा सकता है. उनसे मिलकर कभी प्रतीत ही नहीं हुआ कि मैं भारत सरकार के किसी उच्च-पदस्थ पदाधिकारी से मिल रहा हूँ. कम बोलना, किसी बात पर मुस्कुराना शायद उनकी सबसे विस्तार से की गयी प्रतिक्रया होती होगी. क्योंकि उससे अधिक विस्तृत प्रतिक्रया वे व्यक्त करते ही नहीं.
मैं उनसे उम्र में ज़रा सा ही बड़ा हूँ या समवय भी कह सकते हैं. इस नाते मैंने उन्हें एक बार अनुज कहा और वो दिन और आज का दिन उन्होंने मुझे बड़े भाई के रूप में सम्मान दिया. जब भी उनकी कोई रचना किसी पत्रिका में प्रकाशित हुई, उन्होंने मुझे अवश्य सूचित किया और जब उन्हें साहित्यिक गोष्ठी में कविता पाठ करने का आमंत्रण प्राप्त हुआ तो घबराहट और खुशी के मिले-जुले भावों के साथ उन्होंने मुझे खबर दी. यही नहीं जब कार्यक्रम सफल रहा, तो मुझे फोन पर ऐसे कहा जैसे कोई बच्चा अपना रिपोर्ट कार्ड लेकर भागा चला आया हो यह कहता हुआ कि भैया मैं क्लास में फर्स्ट आया हूँ!!
किसी पोस्ट को लेकर यदि उन्हें तनिक भी संदेह होता कि इस विषय पर, इस बिम्ब पर, इस शब्द पर, इस मुहावरे पर, इस घटना पर कोई भी विवाद हो सकता है या किसी की भावना आहत हो सकती है, तो मुझे वो आलेख भेजकर मेरी राय अवश्य माँगते और मेरे सुझाव को बिना किसी तर्क के स्वीकार कर लेते हैं. बौद्धिक स्तर पर, जब हम दोनों ही ब्लॉग लिख रहे हैं और अलग-अलग लिख रहे हैं, उन्होंने हमेशा स्वयं को लक्ष्मण सिद्ध किया है. हाँ, मैंने भी जिस विषय में मेरी जानकारी न हो, कभी कोई राय नहीं दी.
सरकारी विभाग और सरकारी प्रतिष्ठानों में राजभाषा के नाम पर हिन्दी का चलन सिर्फ हिन्दी में हस्ताक्षर करना, दो चार पत्रों में नाम-पता लिख देना और सालाना जलसा मनाना भर होता है. खासकर मैं तो यही समझता था. लेकिन मनोज जी की लगन और राजभाषा के कार्यान्वयन के प्रति समर्पण देखकर मैं दंग रह गया. हमारे प्रतिष्ठान में राजभाषा अधिकारी के लिए साहित्य (हिन्दी अथवा अंग्रेजी) का डिग्रीधारक होना अनिवार्य है. अतः लाख काम करने के बाद भी मेरी गिनती सामान्य पदाधिकारी की ही रहने वाली है. बस, गुब्बारे से हवा निकल गई और आवश्यकता से अधिक काम करने का जज्बा समाप्त. मनोज जी ने इस काम को अपने कार्यालय में बखूबी सम्भाला और नगर स्तर पर तथा क्षेत्रीय स्तर पर अपने विभाग के साथ-साथ स्वयं के लिए भी कई सम्मान व प्रमाणपत्र प्राप्त किये. उनकी इसी लगन के कारण आज तीन-तीन ब्लॉग हैं उनके और वे नियमित लिख रहे हैं, अनवरत, एक सेवा भावना के साथ.
अब जब दिल्ली से जा रहा हूँ, मनोज जी से मिलना नहीं हो पायेगा. मिलना नहीं से तात्पर्य जितनी आसानी से हम उनके दिल्ली दौरे के दौरान मिल लेते थे, उतनी आसानी से नहीं. ब्लॉग जगत की बातें, साहित्य चर्चाएं, पारिवारिक बातें और पटना की पुरानी यादें. कई बार उन्होंने यह मलाल भी जताया कि उनकी किसी बात को किसी ने गलत समझ लिया और उनके ब्लॉग पर आना बंद कर दिया. एक टिप्पणी के कम होने से अधिक दुःख उन्हें एक मित्र के कम होने का रहा है. उनमें से कुछ के साथ मेरे बहुत अच्छे सम्बन्ध हैं, लेकिन लाचार पाता हूँ खुद को. मैं उन्हें समझता हूँ यही काफी है उनके लिए भी और मेरे लिए भी!
आप सोच रहे होंगे कि अचानक आज मुझे क्या हो गया है कि मैं मनोज जी के ब्लॉग पर आकर, उनकी बातें कर रहा हूँ वो भी फ़ुरसत में और फ़ुरसत से! तो अपना तो सीधा-सादा उसूल है – दुश्मन की पिटाई उसके घर में जाकर करो और दोस्त की मीठी यादें उसके घर में बैठकर बांटो!
